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कुछ दिनों पहले की बात है. ऑफिस में दिवाली का त्यौहार मनाया जाना था. सारे लोगो को हॉल में बुलाया
कैसे हो दोस्तों. आज की कहानी जो में सुनाने जानेवाला हु वो मेरे और मेरी बीवी के बारे में है.
मेरा नाम ऋतुराज है. ये कथा मेरे निजी जीवन में घटी एक सच्ची घटना के आधार पर लिखी है. सुभह
मेरी माँ का नाम शशि है। हम कोयंबटूर में रहते हैं। वह 37 साल की हैं, लेकिन दिखने में उनसे
दोस्तो मैं अंकिता, अपने घर में मैं सब चुदवा चुकी हूँ. मैंने जब जवानी की दहलीज पर कदम रखा तब
सुभह का वक्त था. मेरे पति राकेश नाहा के हॉल में आये. मेने उन्हें नास्ता और चाय दी. मेने राकेश
मेरी बीवी अपनी कपड़ो की दुकान चलाती थी. तो हमने सोचा घरके काम में हात बटाने के लिए हम एक
मेरा नाम अली है. बचपन से घर में गरीबी होने की वजसे ठीक से परवरिश हो नहीं पायी. पापा टैक्सी
मेरी शादी को अब १ साल हो गया था. मेरी बीवी सलोनी काफी दिन से कह रही थी कही बहार
“देखो कल्पना, मैं अब पचास का हो चला हूं। मेरे लिये अब औरत के जिस्म का कोई मतलब नहीं रह