भाभी की जवानी देवर ने चूस ली – Bhabhi dever sex story

सुबह के साढ़े दस बज रहे थे। रविवार का दिन था । घर में सिर्फ हम दोनों ही थे । मैं सोफे पर लेटा था। पेंट के ऊपर सिर्फ बनियान पहनी थी क्यूंकि अभी अभी जिम से आया था तो गर्मी लग रही थी. पसीना अभी पूरी तरह सूखा नहीं था। तभी बाथरूम का दरवाज़ा खुला और अंजलि भाभी अंदर से निकलीं।

गीले बाल कंधों पर बिखरे हुए। हल्की गुलाबी साड़ी शरीर से चिपकी हुई। ब्लाउज का हुक थोड़ा ढीला था। मैंने देखा और मेरी नज़रें रुक गईं। उन्होंने मुझे देखा, पर कुछ नहीं कहा। सिर्फ मुस्कुराईं और किचन की तरफ बढ़ गईं।

“भाभी… पानी का गिलास देदो ना ।

” मेरी आवाज़ निकली । वे गिलास लेकर आईं। जब झुकीं तो साड़ी का पल्लू सरक गया। उनका गला, ब्लाउज की गहराई… सब साफ दिख रहा था। मैंने देखा। उन्होंने भी देखा कि मैं देख रहा हूँ। फिर भी कुछ नहीं बोलीं। गिलास रख दिया और सीधी हो गईं।

“भाई आज भी ऑफिस चला गया,” मेने पूछा।

“हाँ । वीकेंड भी काम। तुम अकेली रह जाती हो हमेशा।

”वे किचन चली गईं। मैं उठा और उनके पीछे गया। वे चाय बना रही थीं। गैस पर दूध उबल रहा था। मैं उनके बिल्कुल पीछे खड़ा हो गया। इतना करीब कि मेरी छाती उनकी पीठ से छू रही थी।

“भाभी…” मैंने धीरे से कहा। उन्होंने सिर घुमाया। हमारी नज़रें मिलीं। मैंने उनका कंधा पकड़ लिया। उनका शरीर थोड़ा तनाव में आ गया, पर हटीं नहीं।

“क्या कर रहे हो?” उन्होंने फुसफुसाकर पूछा।

“कुछ नहीं। बस… तुम्हें देख रहा हूँ।

”मेरा हाथ उनके कंधे से नीचे सरका। उनकी साँस तेज़ हो गई। उन्होंने गैस बंद कर दी। दूध उबलकर फैलने लगा था, पर दोनों को परवाह नहीं थी। मैंने उन्हें घुमाया। दोनों आमने-सामने। किचन की दीवार उनके पीछे। मैंने उनकी आँखों में देखा और कहा । सालों से दबी हुई भूख साफ दिख रही थी। उन्होंने मेरा बनियान पकड़ा और खींचा। मैं झुका और उनके होंठ चूम लिए। पहले हल्का… फिर गहरा चला गया. ।साड़ी का पल्लू फर्श पर गिर गया।

मेरा हाथ उनकी कमर पर था। उनकी साँस मेरे मुँह में घुल रही थी। घर में सिर्फ हम दोनों थे।

और मैं जानता था… आज कुछ और होने वाला है।

उनके होंठ मेरे होंठों पर थे। नरम, थोड़े नम, और भूखे। मैंने उनका निचला होंठ दाँतों से दबाया। अंजलि भाभी की साँस तेज़ हो गई। उनका शरीर मेरे खिलाफ दब गया। किचन की दीवार उनके पीछे थी, मेरी छाती उनके सामने।

मेरा हाथ उनकी कमर से ऊपर सरका। ब्लाउज के ऊपर से उनकी छाती को महसूस किया। गोल, भारी, और गर्म। उन्होंने मेरा हाथ नहीं हटाया। बल्कि थोड़ा और मेरे करीब आ गईं।

“रोहित…” उन्होंने फुसफुसाया। आवाज़ में डर और चाह दोनों थे। मैंने जवाब में कुछ नहीं कहा। बस उनके गले पर होंठ रख दिए। कान के नीचे, जहाँ नाड़ी धड़क रही थी। उन्होंने सिर पीछे झुकाया। साड़ी का पल्लू पहले ही फर्श पर था। अब ब्लाउज का हुक भी मेरे हाथ में आ गया। एक-एक करके खोला।ब्लाउज ढीला पड़ा। उनके अंदर का ब्रा काला था, साधारण। मैंने उसे भी खोल दिया ।

उनकी छाती बाहर आ गई। आह्ह्ह्हह छाती देखकर ही मेरे तन बदन में आग लग गयी. इतने सुन्दर दिख रहे थे दोनों दूध की थैलिया के मुँह में पानी ही आ गया.

निप्पल खड़े थे. गोरे स्तनों को इतने करीब से देखकर मुजसे रहा नहीं गया. मेने दोनों हातो से दबा दिया।

अंगूठे से निप्पल दबाए। वे सख्त हो चुके थे। अंजलि भाभी की कमर लचक गई। एक हल्की सी आवाज़ उनके मुँह से निकली।

“देवर… घर में कोई आ सकता है…”

“नहीं आएगा। भाई आज लेट आएगा। तुम जानती हो।

”मैंने उन्हें उठाया और किचन की काउंटर पर बैठा दिया। साड़ी कमर तक ऊपर चढ़ गई। उनके जांघों के बीच मेरा हाथ चला गया। पैंटी गीली थी। मैंने उंगली अंदर सरकाई। अंजलि भाभी ने मेरे कंधे को जोर से पकड़ लिया।

“आह… धीरे…” मैंने धीरे नहीं किया। उंगली चुत के अंदर-बाहर करने लगा। उनकी साँसें तेज़ हो गईं। वे मेरे गले में मुँह छिपाए कराह रही थीं। मैंने दूसरी उंगली भी डाली। उनके अंदर की गर्मी मेरे हाथ पर फैल रही थी।

“रोहित… बस करो… नहीं…” उनकी आवाज़ टूट रही थी, पर शरीर और खुल रहा था। मैंने पैंटी खींचकर नीचे उतार दी। उनके पैर काउंटर के किनारे पर लटक रहे थे। मैंने अपना पेंट खोला। मेरा लंड पहले से ही सख्त था, नसों में खून दौड़ रहा था। मैंने लंड को उनकी चूत के मुँह पर रखा।अंजलि भाभी ने आँखें खोलीं। हमारी नज़रें मिलीं। उनमें शर्म थी, पर मना नहीं कर रही थीं।

“देवर… अंदर मत डालना… प्लीज़…”मैंने जवाब में सिर्फ धक्का दिया। एक झटके में पूरा अंदर चला गया। अंजलि की चीख निकल गई। उन्होंने मेरे कंधे में दाँत गाड़ दिए। इतना टाइट… इतना गर्म। मैं एक पल रुक गया। फिर धीरे-धीरे बाहर खींचा और फिर जोर से अंदर ठोका। काउंटर हिलने लगी। बर्तन खनक रहे थे। अंजलि भाभी की साड़ी पूरी तरह ऊपर चढ़ी हुई थी। उनकी छाती मेरे हर धक्के के साथ काँप रही थी। मैंने एक स्तन मुँह में ले लिया और चूसने लगा। अह्ह्ह आअह्ह्ह उम्मम्मम ममममम

निप्पल को जीभ से घुमाया।

“रोहित… और जोर से… आह…”अब वे खुद कह रही थीं। मैंने दोनों जांघें पकड़कर और चौड़ा किया। और तेज़ ठोकने लगा। हर धक्के के साथ उनकी चूत की आवाज़ आ रही थी—गीली, चिपचिपी। मेरे लंड पर उनका पानी लग रहा था। अंजलि की आँखें बंद थीं। होंठ खुले। कराहें निकल रही थीं।मैंने उनका गला पकड़ा। हल्का दबाया। उनकी आँखें खुलीं। डर और मज़ा दोनों साफ दिख रहे थे। मैंने और तेज़ किया। काउंटर पर उनका शरीर आगे-पीछे हो रहा था।

“मैं… मैं आने वाली हूँ…” उन्होंने हाँफते हुए कहा।मैंने और जोर दिया। उनके अंदर की दीवारें सिकुड़ने लगीं। वे मेरे लंड को जकड़ रही थीं। अचानक उनका शरीर ऐंठ गया। एक लंबी कराह निकली। उनके पैर मेरे कमर के इर्द-गिर्द लिपट गए। वे काँप रही थीं। मैं रुक नहीं पाया। कुछ और धक्के दिए और फिर अपना पानी उनके अंदर छोड़ ही छोड़ दिया।

आह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह उम्मम्मम्मम्म भाभी आह्ह्ह्हह

गर्म, गाढ़ा पानी । उनके अंदर भरता चला गया। हम दोनों हाँफ रहे थे। पसीना बह रहा था। किचन में दूध फैल चुका था। गैस बंद थी। घर में पूरा सन्नाटा था।अंजलि भाभी की आँखों में आँसू थे। पर वे मुस्कुरा रही थीं। मैंने धीरे से लंड बाहर निकाला। उनका पानी और मेरा वीर्य मिला-जुला उनकी जांघों पर बह रहा था।

“अब क्या होगा…” उन्होंने फुसफुसाया। मैंने उनका चेहरा थामा। “अब सिर्फ शुरुआत हुई है, भाभी।”

किचन की काउंटर पर अंजलि भाभी अभी भी बैठी थीं। साड़ी कमर तक ऊपर चढ़ी, ब्लाउज खुला, छाती उघड़ी। उनके जांघों पर मेरा वीर्य और उनका पानी मिला-जुला बह रहा था। साँसें अभी भी तेज़ थीं। आँखों में आँसू थे, पर मुस्कान भी।मैंने अपना पेंट ऊपर खींचा। उन्होंने भी धीरे-धीरे साड़ी ठीक करने की कोशिश की, पर हाथ काँप रहे थे। मैंने उनका ब्लाउज बंद करने में मदद की। हुक लगाते समय मेरी उंगलियाँ उनके स्तनों से छू गईं।

उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस मुझे देखा।

“अब क्या होगा…” उन्होंने फिर पूछा। आवाज़ बहुत धीमी थी। मैंने उनका चेहरा दोनों हाथों में लिया।

“कुछ नहीं होगा। भाई को कुछ पता नहीं चलेगा। और अगर चला भी… तो हम दोनों जानते हैं कि घर में असलियत क्या है।

”अंजलि भाभी चुप रहीं। फिर उन्होंने मेरा सिर पकड़कर अपने सीने से लगा लिया। मैंने उनकी छाती के बीच में माथा टिकाया। उनकी धड़कन मेरे कानों में गूँज रही थी।

“तुम सालों से मुझे ऐसे देखते आ रहे हो,” उन्होंने फुसफुसाया। “मैं जानती थी। पर कभी हिम्मत नहीं हुई… आज तक।

”मैंने सिर उठाया। “आज हिम्मत हो गई। और अब पीछे नहीं हटूँगा।

”मैंने उन्हें काउंटर से उतारा। उनके पैर ज़मीन पर टिकते ही थोड़ा लड़खड़ाए। मैंने कमर पकड़ ली। दोनों किचन से बाहर निकले। लिविंग रूम में सोफे पर बैठ गए। अंजलि भाभी मेरे बगल में थीं। साड़ी अभी भी अव्यवस्थित। बाल बिखरे। गालों पर हल्की लालिमा। मैंने उनका हाथ पकड़ा।

“आज रात जब भाई सो जाएगा… तुम मेरे कमरे में आना।

”अंजलि भाभी ने मेरी तरफ देखा। आँखों में डर था, पर इंकार नहीं। उन्होंने सिर्फ सिर हिलाया। दोपहर बीत गई। शाम हुई। भाई घर आया। थका हुआ, लेपटॉप बैग लिए। खाना खाया, टीवी देखा, फिर कमरे में चला गया। अंजलि भाभी सामान्य बनने की कोशिश कर रही थीं। चाय बनाई, बातें कीं, मुस्कुराईं। पर जब हमारी नज़रें मिलतीं, तो दोनों जान जाते कि अंदर क्या चल रहा है। रात के साढ़े बारह बजे। घर में अँधेरा। भाई की खर्राटे सुनाई दे रहे थे।अंजलि मेरे कमरे के दरवाज़े पर खड़ी थीं। साड़ी नहीं, सिर्फ नाईटी। पतली। अंदर कुछ नहीं। मैंने दरवाज़ा खोला। वे अंदर आईं। मैंने पीछे से ताला लगा दिया।

इस बार कोई जल्दबाज़ी नहीं थी। मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटाया। नाईटी ऊपर खींची। उनके पूरे शरीर को चूमा—गर्दन, स्तन, पेट, जांघें। फिर उनके पैर फैलाए और मुँह उनके बीच रख दिया। जीभ से चाटा। अंजलि भाभी ने तकिया मुँह में दबा लिया ताकि आवाज़ न निकले।

आह्हः हम्म्म्म्म आह्हः

उनके पैर मेरे सिर के दोनों तरफ काँप रहे थे। जब वे गीली हो गईं, तो मैं ऊपर चढ़ गया। इस बार धीरे। लंड को पूरा अंदर धकेल दिया । अंजलि ने मुझे कसकर पकड़ लिया। हम दोनों एक-दूसरे में खो गए। बिस्तर हिल रहा था। धीमी कराहें। पसीना। चूमना। काटना सब चल रहा था ।

फिर मैंने उन्हें घुमाया। पीछे से लंड को चुत में डाला। उनके बाल पकड़े। कमर दबाई। हर धक्के के साथ वे मेरे नाम फुसफुसा रही थीं।जब दोनों चरम पर पहुँचे, तो अंजलि भाभी ने मेरे हाथ को अपने मुँह पर दबा लिया। उनकी चीख मेरे हाथ में दब गई।

अह्ह्ह्ह आअह्ह्ह अहहह अह्ह्ह उम्मम्मम

कुछ देर चुदाई चली और फिर मैंने उनके अंदर ही पानी छोड़ दिया फिर से। बाद में हम दोनों लेटे रहे अँधेरे में। उनका सिर मेरे सीने पर था।

“यह गलत है…” उन्होंने धीरे से कहा।

“हाँ,” मैंने जवाब दिया।

“पर अब रुकने वाला नहीं है।

”अंजलि भाभी चुप रहीं। फिर उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और अपनी छाती पर रख दिया। कुछ देर बाद वो चुपचाप उठकर चली गईं। अपने कमरे में। भाई अभी भी सो रहा था।मैं अकेला बिस्तर पर लेटा रहा। कमरे में उनकी खुशबू बाकी थी। चादर पर गीले निशान।अब घर पहले जैसा नहीं रहेगा।हर बार जब भाई ऑफिस जाएगा…

हर बार जब घर खाली होगा…

हर बार जब रात गहरी होगी…अंजलि भाभी आएंगी।

और मैं भाभी की लूंगा । यह सिर्फ एक दिन की बात नहीं थी।

यह अब हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुका था।

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